ये नही लगता पता के क्यूं बनी है जिंदगी ?
बैठने देती नही, पीछे पडी है जिंदगी
हर किसी ने की शिकायत, जिंदगी के नाम से
पर कोई कहेता नही के - "तू बुरी है जिंदगी "
हो सके तो तुम बता दो, हौसला दे दो इसे
हर जरासी बात पर क्यों ,रो रही है जिंदगी ?
है जरा कमजोर फिर भी गम नही इस का मुझे
बोझ खुद का खुद उठा कर चल रही है जिंदगी
खुदकुशी की राह पर मै चल ना पाया आज तक
रोक कर हर रासता, अब तक खडी है जिंदगी
अब तलाश-ए-मौत ही तो बन गया ह मशगला
लोग क्यों कहते है मेरी खो गयी है जिंदगी ?
देर तक सो ने की आदत, है इसे मेरी तरह
ख्वाब के चादर मे लिपटी सो रही है जिंदगी
- यादगार
तलाश-ए-मौत - मृत्यूचा शोध
मशगला - दिनचर्या
गझल
- प्रतिसाद देण्यासाठी येण्याची नोंद करा