रजनीगंधा

सुनेत्रा सुभाष - ⏱ १ मिनिट

रजनीगंधा  उमलत  जाता  नव-वर्षाचा  नाचे  मोर
सरत्या  वर्षा  निरोप  देउन  निजे  जुईची  नाजुक  पोर


वर्षे  येती  आणिक  जाती  तुम्ही  वेगळे  केले  काय?
ज्याला -त्याला  टोचुन  पुसती  बाभुळ  आणी  खट्याळ  बोर


पुरे  जाहल्या  चो-या मा-या  हा  कंठा  घे  शेवटचाच
पुन्हा  तेच  ते  प्रियेस  सांगे  भल्या  पहाटे  कोणी  चोर


लेकुरवाळी  कण्हेर  यंदा  मिळवायाचे  म्हणते  दाम
ठरवित  बसते  वेळापत्रक  फुलण्याचेही  काटे कोर


काटेरी  जाळीवर  हिरव्या  करवंदांचे  लोभस  घोस
टपटपणारे  जलद  म्हणूकी  नेत्र  सई  तव  काळे भोर


गतवर्षांच्या  पानांवरची  फूंक  सुनेत्रा  हळूच  धूळ
लिंबोणीच्या  फांद्यांमधुनी  दिसेल  तुज  बीजेची  कोर

गझल