संकेतस्थळावर प्रकाशित झालेल्या गझला
| शीर्षक | लेखक | प्रकाशन दिनांक |
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| धान्य हा तर दारूसाठी माल कच्चा.. | कैलास गांधी | |
| हा काळ हरामी मलाच गंडा घालून जातो | कैलास गांधी | |
| वाटे कधी कधी | कैलास | |
| किती सोपे मला हे प्रेम करणे वाटले होते... | बहर | |
| खुळा साज आहे.. | बहर | |
| पाणपोई | अनिल रत्नाकर | |
| शक्य नाही | स्नेहदर्शन | |
| असे नव्हे | मिल्या | |
| आसवे आता न केवळ गाळती माझे नयन | कैलास | |
| आता जरा मी लबाड झालो | कैलास गांधी | |
| सोसले ना लाड ते कंगाल झाले | कैलास गांधी | |
| आरसा पाहायचा राहून गेला | निलेश कालुवाला | |
| नाबाद | बहर | |
| माझ्या तुझ्यात काही | जयन्ता५२ | |
| कोणत्या चिमटीत मी त्याला धरू | चित्तरंजन भट | |
| ध्वस्त झालो गाव सांगे पूर जेव्हा ओसरे | कैलास गांधी | |
| कर्जमाफीच्या आमिशावर अशी माजली शेते | कैलास गांधी | |
| सुटे, मोकळे होण्यामध्ये हात जरा गुरफटले होते | कैलास गांधी | |
| पुढे सरू की जाऊ मागे... | वैभव देशमुख | |
| चांदण्या लेऊन झाला... | ह बा |