संकेतस्थळावर प्रकाशित झालेल्या गझला
| शीर्षक | लेखक | प्रकाशन दिनांक |
|---|---|---|
| शहर झाले चांदण्याचे | चित्तरंजन भट | |
| 'व्यथा'....(गझल) | mamata.riyaj@gmail.com | |
| की ? कागदाशी खेळणारा टाक आहे ? | मयुरेश साने | |
| ते सिंह गर्जनेला कोल्हे कुई म्हणाले................... | मयुरेश साने | |
| अजून श्वास पाळती ! तुझ्या खुणा पुन्हा पुन्हा...... | मयुरेश साने | |
| भेटतो जरी अता नेहमी हसून पण | शाम | |
| कोजागिरी !!! | supriya.jadhav7 | |
| ...पण सुरूच आहे रहदारी ! | प्रदीप कुलकर्णी | |
| ... स्मरण असावे | अजय अनंत जोशी | |
| ''वाटतो जरी प्रसन्न मी वरुन'' | कैलास | |
| आवेग दाटलेला !!! | supriya.jadhav7 | |
| सांजवेळी आठवांचा मेघ हा दाटे पुन्हा.. | शाम | |
| मनाला किती अन् कसे आवरावे? | शाम | |
| छडा लागला रे | सुरेश शिरोडकर | |
| ....सारे मला मिळाले !!! (गझल). | supriya.jadhav7 | |
| वाढती का अंतरे? | क्रान्ति | |
| भरावे शेत वात्सल्यात... | अजय अनंत जोशी | |
| साचला अंधार आहे... | वैभव देशमुख | |
| दे चार श्वास दे रे .. | शाम | |
| शब्द बेईमान झाले आज इतके काय सांगू? | विजय दि. पाटील |