संकेतस्थळावर प्रकाशित झालेल्या गझला
| शीर्षक | लेखक | प्रकाशन दिनांक |
|---|---|---|
| तुझी आभाळपुण्याई तुकोबा | वैभव वसंतराव कुलकर्णी | |
| हा स्वत्वाचा तपास मानू आता | बेफिकीर | |
| अमल | विजय दि. पाटील | |
| खोल डोहाच्या तळाशी साचलेला गाळ हो | बेफिकीर | |
| नदीला सागराची ओढ असली तर असू द्या ना | मिल्या | |
| एकदा शून्यास माझ्या तू वजा कर... | जयदीप | |
| इरेला पेटला आहे पिसारा | अजय अनंत जोशी | |
| खुल्या मनाने | केदार पाटणकर | |
| नेहमी गर्दी तुला जी लागते | जयदीप | |
| अबोल | कैलास | |
| हसवणारे, खिदळणारे | केदार पाटणकर | |
| ऎकले आहे तुला ती साथ देते | जयदीप | |
| जागरण डोळ्यांमधे आता लमाण्यासारखे नाही | चित्तरंजन भट | |
| अतोनात तिटकारा येतो | supriya.jadhav7 | |
| रस्ता देतो | जयदीप | |
| वारे जरासे गातील काही.. | अजय अनंत जोशी | |
| जन्मतो गर्दीत आपण......संपतो गर्दीत पण | बेफिकीर | |
| ज्या क्षणी मी थांबलो, ती थांबली | जयदीप | |
| शेवट लिहलेला असतो सुरुवातीवरती | शाम | |
| तुझ्यासारखे वाचता येत नाही | जयदीप |