संकेतस्थळावर प्रकाशित झालेल्या गझला
| शीर्षक | लेखक | प्रकाशन दिनांक |
|---|---|---|
| विश्व समजू लागलो अपुल्या घराला | वैभव देशमुख | |
| ...देव आहे अंतरी | अजय अनंत जोशी | |
| जगण्याचे मातेरे होते... | वैभव देशमुख | |
| शब्द बेहोश कर.. | सुशांत खुरसाले. | |
| जन्म वाभरा | वैभव वसंतराव कुलकर्णी | |
| मनाच्या अडगळीमधले बिलोरी आरसे शोधू | जयदीप | |
| मागे जयजयकार चालला आहे | बाळ पाटील | |
| आवरण | ज्ञानेश. | |
| झोप लागायला पाहिजे | जयदीप | |
| काय देईल गारवा रस्ता | बेफिकीर | |
| मन आता हे कळल्यावरती उदास नाही.. | जयदीप | |
| हासल्यासारखी भासती माणसे | बेफिकीर | |
| गझल : ज्यामुळे जग ही नशीली रम्यता राखून आहे | वैभव वसंतराव कुलकर्णी | |
| गझल : माझ्या लक्षातच नाही | वैभव वसंतराव कुलकर्णी | |
| संगमावरी दोन्ही प्रवाह तुंबळ लढणे | बेफिकीर | |
| मधेच वाहते मधेच थांबते | जयदीप | |
| स्त्री समीप येते ... | अजय अनंत जोशी | |
| सांग कसे ते कण्हतानाही गात असावे... | जयदीप | |
| नको तसे घडण्यावरती ह्यासाठी मन जडले होते | बेफिकीर | |
| वरून शांत शांत वाटते किती... | जयदीप |