संकेतस्थळावर प्रकाशित झालेल्या गझला
| शीर्षक | लेखक | प्रकाशन दिनांक |
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| तुझे घन आजही बरसून माझी आसवे गेले | वैभव वसंतराव कुलकर्णी | |
| आजच्या आज | विजय दि. पाटील | |
| जे जगतो ते लिहिणारा | विजय दि. पाटील | |
| गझल | अनंत ढवळे | |
| पाहिजे तेव्हा कुणीही... | केदार पाटणकर | |
| तुझे स्वच्छ हासू झळाळी उन्हाची... | वैभव देशमुख | |
| तीच भेटावी.. | केदार पाटणकर | |
| लेक माझी चालली… | अरविन्द पोहरकर | |
| मढे मोजण्याला | गंगाधर मुटे | |
| गलबत कुठे निघाले | केदार पाटणकर | |
| जन्म एक मध्यरात्र वाटतो | वैभव वसंतराव कुलकर्णी | |
| माणसांना माणसांचे | केदार पाटणकर | |
| पायथा बांधायला आधार नव्हता जोरकस | बेफिकीर | |
| पिणे सोडले मी…. | अरविन्द पोहरकर | |
| तुझे आच्छादलेले जग मला सांगून जाते | बेफिकीर | |
| भलतीच मर्यादीत ह्यांची झेप आहे | बेफिकीर | |
| एवढे नसते जलद आयुष्य सरण्यासारखे! | प्रोफेसर | |
| कशाचा शोध काही घेत नसतो | चित्तरंजन भट | |
| माझ्यातला चांगुलपणा वर आण तू | बेफिकीर | |
| आई मेंढ्या हाकत आहे, बाप दिवंगत आहे | बेफिकीर |