संकेतस्थळावर प्रकाशित झालेल्या गझला
| शीर्षक | लेखक | प्रकाशन दिनांक |
|---|---|---|
| मिसरे | क्रान्ति | |
| मी विस्कटल्या खोलीत मनाच्या.. | बहर | |
| शिखर त्यांनी गाठलेले - | विदेश | |
| मी डाव मांडलेला........ | मनिषा नाईक. | |
| मरण्यात अर्थ नाही | गंगाधर मुटे | |
| पुन्हा पुन्हा !! | supriya.jadhav7 | |
| आज भारंभार झाली आसवे !!! | supriya.jadhav7 | |
| बंडाचा झेंडा कधीच नव्हता हाती! | क्रान्ति | |
| बघ तुझ्या येण्यामधे हे केवढे मांगल्य आहे | विजय दि. पाटील | |
| ''श्वास झाला मोकळा की,कोंडल्यागत वाटते'' | कैलास | |
| भाष्य | कुमार जावडेकर | |
| तू ..... | supriya.jadhav7 | |
| मोडून यार गेला संसार आज माझा .. | शाम | |
| प्रकाश स्वप्ने.. | बहर | |
| बघ कशा संवेदना गातात माझ्या | मयुरेश साने | |
| असे बाहेर डोकावू नका आतील दु:खांनो.... | बेफिकीर | |
| अर्थ आहे | क्रान्ति | |
| सारे वसंत... | विद्यानंद हाडके | |
| पेटत्या वातीच माळू | अनिल रत्नाकर | |
| अजूनही | आनंदयात्री |